आख़िर क्यों उत्तर प्रदेश में अखिलेश के नेतृव में समाजवादी फेल- नज़रिया

नज़रिया: फरमान अब्बासी लेखक
बीजेपी की दोबारा केंद्र में सत्ता इस तरह आना सभी विपक्षी दलों के लिए बड़ा जख्म तो साबित हुआ ही है। साथ ही उन्हें एक सबक भी मिला है। चौकीदार चोर है, राफेल विमान, नोटबन्दी, जीएसटी, जवानों की शहादत, काला धन, पकौड़ा, बेरोज़गारी, भुखमरी सब कुछ नज़र अंदाज़ कर देश की बड़ी संख्या में जनता ने मोदी को दोबारा बेताज बादशाह बना ही दिया। इससे ये साबित होता है कि विपक्ष ने चाहे मोदी के बयानों की कितनी भी खिल्ली उड़ाई हो, बीजेपी नेताओं के बयानों में भले ही बेतुकी बयानबाजी रही हो, मगर भाजपा अपने वोट बैंक को रिझाने में सौ फीसदी कामयाब रही। उन्हें इससे कोई फर्क नही पड़ा कि उनके बयान अमर्यादित है या फिर असवैधानिक या हसी के पात्र, उन्होंने सिर्फ वो किया जो उनके वोटर्स सुनना और देखना चाहते थे, मगर सपा, बसपा, कांग्रेस इसमे फेल साबित हुई, यही वजह है कि डिम्पल यादव, अक्षय यादव, धर्मेंद्र यादव के अलावा राहुल गांधी तक अपनी सेफ सीटे बचाने में नाकामयाब साबित हुए।

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इस बात को नकारा नही जा सकता कि सपा, बसपा का वोट बैंक मुस्लिम व दलित है। बसपा तो काफी हद तक दलितों की आवाज़ उठाती आई है, मगर सपा ने अखिलेश के नेतृव में मुस्लिमो के मुद्दों को लगातार नज़रंदाज़ किया है। बीजेपी की तरह अखिलेश यादव अपने वोट बैंक की आवाज़ बनने में नाकामयाब साबित हुए। देखा जाये तो अब भी वक्त है, सही निर्णय लेने का, ये भी सच है कि अखिलेश यादव मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के दम पर बने थे, लेकिन उन्होंने मुलायम सिंह को ही दरकिनार कर खुद को राजनीति में बेहतर समझा, और ये उदाहरण है अखिलेश के नेतृव में लगातार पार्टी गिरती ही चली गई।

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अगर बसपा उद्योगपतियों को टिकट देती है तो सपा भी संघर्षशील व मेहनती कार्यकर्ताओ व नेताओ को कहा सम्मान दे रही है। सिर्फ चन्द लोगो की पार्टी बनकर रह गई है सपा। 2017 विधानसभा चुनाव में जितना जरूरी बसपा से गठबन्धन करना था, उतना ही जरूरी लोकसभा में कांग्रेस के साथ गठबन्धन जरूरी था। विपक्षी पार्टियां मुस्लिमो में भाजपा का भय दिखाकर उनमें डर व खौफ भर देती है। और उसी का फायदा उठाकर बीजेपी अपने वोटर्स को लुभाती है, जबकि मेरे लोकतांत्रिक देश मे कोई भी किसी का कुछ बिगाड़ नही सकता।

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