क्या है हिंदी साहित्य? समझिए हमारी सहयोगी सुशीला रोहिला सोनीपत (लेखिका) की क़लम से!

साहित्य समाज का दर्पण है । साहित्य के बिना शिक्षा की नींव मजबूत नहीं हो सकती । जिस प्रकार एक भवन रेत की बनी नींव पर टिक नहीं सकता ।इसी प्रकार दूषित साहित्य तथा शिक्षा एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण नहीं कर सकती । साहित्य चाहे किसी भी भाषा का क्यों न हो वह उच्च कोटि का होना चाहिए । उच्च कोटि में वह साहित्य आता है जिसमें आदर्शवादिता , प्रेम की भावना, मर्यादा, लज्जाशील , आज्ञाकारी, सेवा की भावना तथा सद्भावना छुपी हो ।वर्तमान समय जैसे अच्छे साहित्य का लोप सा हो गया । लेखक भी पैसे कमाने के लिए अश्लील साहित्य का भी सर्जन करते है ।आज की युवा पीढ़ी तथा कामुक व्यक्ति अश्शील साहित्य को पढने के शौकीन होते है । इससे ऐसा साहित्य ज्यादा मात्रा मे बिकने लगता है । साहित्य और शिक्षा समाज की नींव है । जुनियर और सीनियर श्रेणी के बच्चों में बुरी लत होती जो आगे चल कर एक भंयकर रूप ले लेती है । जिससे बच्चों में बलात्कार आतंकवाद, उग्रवाद, नकस्लवाद भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी जैसी भावना का जन्म होता है जो समाज के लिए कष्टसाध्य है। भारत देश ऋषि -मुनियों की धरोहर है यहाँ ज्ञान की गंगा सर्वदा बहती आई है और बहती रहेगी । महपुरूष इस धरा धाम पर सर्वदा नित्य गुरु, सद्गुरु के रूप मी रहते और समाज को पतन के रास्ते पर जाने से रोकते है। आदिकाल के जितने भी हमारे कवि तथा लेखक हुए उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से कुप्रथाओ, कुरीतियों, जात -पात के भेद भाव को दूर करने का भरसक प्रयास किया ।

साहित्य समाज का आइना है । साहित्य रूपी आइना धूमिल हो जाए तो शिक्षा रूपी चहेरा धुधंला नजर आयेगा

भक्ति कालीन के कवियों ने तुलसी दास ,कबीर दास वाल्मीकि ऋषि आदि कवियों का काव्य कितना गुढमय था

जो मानव जाति को एक सुत्र में पिरो कर एक श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण किया।

आज बच्चों में राम ,कृष्ण , महत्मा बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण,परमहंस , भगत सिंह, वीर शिवा , रानी लक्ष्मीबाई, कल्पना चावला, मैदर टैरिसा , राज राजेश्वरी , हंस , सद्गुरु रूपी अवतार की भावना तभी जन्म लेगी जब हम उनके आदर्शों, चरित्रों को पढकर जीवन में उतारते है ।
यह भावना एक शिक्षा प्रद साहित्य ही उदित कर सकता है ।

चेतावनी
वर्तमान समय में ऐसे साहित्य की रचना नहीं हुई तो भावी पीढी को सुरक्षित नहीं कर पाएँगे और इसके जिम्मेदार पूरा
लेखक वर्ग होगा । आओ सभी निजी स्वार्थ को त्याग कर ऐसे साहित्य की रचना करे जो स्वयं तथा राष्ट्र के हित में अहं भूमिका अदा करें । यह भावना जब हमारी अपनी होगी तभी समाज में परिवर्तन आ सकता है ।

आज शिक्षित समाज की कमी नहीं , कमी है संस्कारों की जो हम पाश्चात्य की सभ्यता से भूलते जा रहे है । आज क्यों साक्षर होते हुए भी व्यक्ति आतंकवाद, नक्सलवाद, उग्रवाद , भ्रष्टाचार , कामुकता का रूप लिए हुए है । वह अक्षरी विधा से तो परिचित है लेकिन परा विद्या ( आत्मिक तत्व ) से कोसो दूर है । भौतिकवाद की चंचलता ने उसके मन की चंचलता को बढ़ा दिया है । मन स्थिर न होने के कारण स्वयं की शक्ति को भूल कर स्वार्थ की अग्नि में जल रहा है । मोह के वशीभूत होकर अज्ञानता के तिमिर ने उसके विवेक को ढक रखा । इसलिए वह अपने कर्तव्यों का निष्ठा से निर्वहन नहीं करता ।

एक अच्छा साहित्य राष्ट्र की भाषा पर भी निर्भर करता है ।
हमें हिन्दी भाषा के साहित्य को बढ़ावा देना चाहिए ।
क्यों कि हिन्दी हमारी राजभाषा तथा मातृभाषा भी है ।
हिन्दी में वह तत्व छुपा है जो हमें भाई चारा, एकता तथा सद्भावना से जोड़ कर रखता है ।

आओ सभी मिलकर भारतीय साहित्य का दीप जलाए ।
साहित्य समाज का दर्पण है ,अपना स्वरूप जगाए।
विकार रहित हो मन हमारा , ऐसा साहित्य पढ़े- पढांए।
शांति का साम्राज्य लाए,भारत माता को विश्व गुरु बनाएँ ।

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