गुर्दे और जोड़ों की समस्याओं को बढ़ाता है मॉनसून

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ग्वालियर : मॉनसून कई बीमारियों को साथ लेकर आता है। इसी के साथ मॉनसून के दौरान आर्थोपेडिक्स और गुर्दे के संक्रमण के मामलों में वृद्धि होती है। हालांकि, अगल-अगल उम्र के लोग समान रूप से कमजोर होते हैं, लेकिन बुजुर्ग वर्ग के रोगी जो गुर्दे और जोड़ों की समस्याओं के इलाज से गुज़र चुके होते हैं, उनपर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है।
ग्वालियर में रोगियों की सहायता के लिए, वसंत कुंज स्थित फोर्टिस अस्पताल ग्वालियर के कैलाश अस्पताल में आर्थोपेडिक्स और नेफ्रोलॉजी के लिए हर महीने ओपीडीसेवा का आयोजन करता है।
मौसम से संबंधित जोड़ों का दर्द आमतौर पर ऑस्टियोआर्थराइटिस और रुमेटाइड गठिया के रोगियों में देखा जाता है और यह आमतौर पर कूल्हों, घुटनों, कोहनी, कंधों और हाथों को प्रभावित करता है। जोड़ों में संवेदनशील तंत्रिकाएं होती हैं जिन्हें बैरोकैप्टर्स कहा जाता है। या तंत्रिकाएं बैरोमीटर के परिवर्तनों का पता लगा सकती हैं। रिसेप्टर्स विशेष रूप से तब प्रतिक्रिया करते हैं जब बैरोमीटर का दबाव कम होता है, जैसे कि तेज बारिश के पहले यह दबाव कम हो सकता है।
वसंत कुंज स्थित फोर्टिस अस्पताल में आर्थोपेडिक्स सलाहकार, डॉक्टर विश्वदीप शर्मा ने बताया कि, “गठिया के रोगी बैरोमीटर के परिवर्तनों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। कम बैरोमीटर के दबाव के साथ अधिक उमस के कारण जोड़ों का दर्द बढ़ जाता है और अकड़न भी अधिक महसूस होती है। शारीरिक गतिविधि और व्यायाम दर्द, कार्य और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करके गठिया से पीड़ित लोगों को आराम पहुंचाता है। बहुत कम और अत्यधिक आसान एक्सरसाइज करने से गठिया वाले व्यक्तियों को हृदय रोग, डायबिटीज, मोटापा और काम करने में कठिनाई जैसी बीमारियों का खतरा हो सकता है, जो शरीर में गतिविधि की कमी के कारण जन्म लेती हैं।”
आज की पीढ़ी एक गतिहीन जीवनशैली को बढ़ावा दे रही है। लोग लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठे रहते हैं। खासकर कि ऑफिस में कर्मचारी गलत मुद्रा में बैठकर पूरा दिन बिता देते हैं। इसके अलावा, देर रात की शिफ्ट, धूम्रपान, कंप्यूटर के सामने लंबे समय तक बैठने और अनियमित खान-पान से आर्थोपेडिक्स और गुर्दे की बीमारियां हो रही हैं, जो मॉनसून में सबसे ज्यादा देखने को मिलती हैं। ये बीमारियां सही उम्र से पहले होने लगी हैं। परिणामस्वरूप, युवा इन बीमारियों का अधिक शिकार हो रहे हैं।
फोर्टिस अस्पताल में नेफ्रोलॉजी सलाहकार, डॉक्टर तनमन पांड्या ने बताया कि, “तापमान में अचानक बदलाव से इम्यून सिस्टम कमजोर हो ताजा है जिसके कारणशरीर संक्रमण की चपेट में आ जाता है। मॉनसून एक ऐसा वातावरण (गर्म और उमस भरा) तैयार करता है जिसमें बेक्टीरिया और वाइरस आसानी से पनपते हैं। नमबातावरण के दौरान, शरीर के प्राइवेट भागों की नियमित सफाई और व्यक्तिगत स्वच्छता बहुत जरूरी है, क्योंकि ऐसा न करने से गुर्दे में संक्रमण, गड़बड़ी और घाव हो सकते हैं। किडनी में घाव होना बहुत आम है और भविष्य में हाई बल्ड प्रेशर और किडनी की कार्यप्रणाली कमजोर पड़ सकती है।”
सबसे अच्छी सलाह यह है कि, जितना संभव हो उतना सतर्क रहें। मौसम की परवाह किए बिना पूरे साल अपना स्वास्थ्य का ख्याल रखें। खूब पानी पिएं और बिना वजन वाली एक्सरसाइज और स्ट्रेचिंग करके जोड़ों को सक्रिय रखें। अगर शुरुआत में ही इस बीमारी की पहचान हो जाती है तो दवाओं की मदद से इसे जल्द ठीक किया जा सकता है। लेकिन, अगर इसकी पहचान करने में देर हो जाती है, तो स्थिति गंभीर हो जाती है और बिना सर्जरी के इसका इलाज संभव नहीं है।
डॉक्टर तनमन पांड्या ने आगे बताया कि, “मॉनसून के मौसम में किडनी के संक्रमण को रोकना ज्यादा आसाना है। पानी, ताजा जूस और सूप जैसे तरल पदार्थों का अधिक सेवन करने से मूत्र का प्रवाह बढ़ जाता है और संक्रमण की संभावना कम हो जाती है। ज्यादा से ज्यादा मौसमी फलों का सेवन करें और पेशाब को लंबे समय तक रोककर न रखें।”
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