क्या CAA कानून को लेकर भय का भूत बनाया जा रहा है?

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नागरिक संसोधन कानून (CAA) 2019 के खिलाफ लोग विरोध- प्रदर्शन कर रहे हैं. उत्तरपूर्व राज्यों से फैली हिंसा की आग राजधानी दिल्ली तक पहुंच गई. दिल्ली में भी सरकारी प्रॉपर्टी और बसें धुंधूकर जल रही हैं.केंद्र सरकार यही मानकर चल रही थी कि CAA कानून पर उत्तर भारत के राज्यों में ही हिंसा भड़केगी, लेकिन पूरे भारत में हिंसक की आग में धधक रहा है. सड़क पर उग्र आंदोलन हुई भीड़ पर पुलिस लाठियां फटकार रही है,लेकिन विरोध-प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहा है.

देश में प्रतिदिन हालात बिड़कते जा रहे है. क्या मोदी सरकार लोगों को सीसीए कानून को समझाने में कहीं न कहीं विफल साबित हो रही है? क्या देश में अल्पसंख्यकों के बीच नागरिकता जाने का डर बनाया जा रहा है? मेरे मन में कई ऐसे सवाल उठ रहे है. लोकतंत्र में शांतिपूर्वक तरीक़े से आंदोलन कर सकते हैं, भारत जैसे लोकतांत्रिक वाले देश में तो हिंसा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. देश में हर तरफ चीख- पुकार मच रही है. बेकाबू भीड़ पुलिस पर पत्थरबाज़ी कर रही है.

मोदी सरकार का मानना है कि भय का भूत बनाया जा रहा है. केंद्र सरकार पहले ही साफ कर चुकी है कि CAA कानून लोगों को नागरिकता देने का कानून हैं, न की किसी भी नागरिक की नागरिकता लेने का कानून है. वहीं, तमाम विपक्षी पार्टियां दावा कर रही हैं कि यह कानून धर्म के आधार पर बनाया गया. संविधान के आर्टिकल 14 समानता के अधिकार का उल्लंघन किया जा रहा है.

इतना ही नहीं अभी जो बिल यानी एनआरसी संसद में नहीं आया है.एनआरसी (NRC) को लेकर देश में डर का माहौल बनाया जा रहा है. CAA और NRC को एक दूसरे के साथ जोड़कर देखा जा रहा हैं. अभी तक नेशनल रजिस्टार सिटीजनशिप (NRC) असम राज्य में लागू किया गया है.

एनआरसी फाइनल लिस्ट असम में 31 अगस्त 2019 को जारी की गई. इससे पहले 30 जून 2019 को 40 लोगों को एनआरसी से बाहर रखा गया. जिसमें असम के 19 लाख लोगों को सूचीबद्ध किया गया हैं. एनआरसी के लिए लगभग 3 करोड़ लोगों द्वारा आवेदन किया गया. जो 19 लाख लोग 25 मार्च 1971 से पहले अपने पूर्वजों के कोई दस्तावेज नहीं दिखा पाएं. वे सभी लोग फॉरेन ट्रिब्यूनल में जा सकते हैं. इसके अलावा गुवाहाटी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं. फॉरेन ट्रिब्यूनल के विदेश नागरिक घोषित होने के बाद ही डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा.

नागरिकता संशोधन 2019 कानून है क्या? 31 दिसम्बर 2014 से पहले बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तीनों देशों से आएं हिन्दू, सिख,जैन,पारसी, इसाई,बौद्ध, शरणार्थियों को नागरिकता दी जाएगी. नागरिकता संसोधन बिल साल 1955 में लाया गया. जिसके बाद अब तक इस बिल में 5 बार संसोधन हो चुके हैं.

क्या (CAA)कानून को लेकर अल्पसंख्यकों को डराया जा रहा हैं?सीसीए (CAA) 2019 कानून बन जाने के बाद यह बात साफ है कि देश के किसी भी नागरिक का इस कानून से कोई लेना देना नहीं है. फिर अल्पसंख्यक समुदाय के लोग क्यों सड़क पर उतरकर विरोध- प्रदर्शन कर रहे है? क्या वाकई भय का भूत बनाया जा रहा है?

देश में हर जगह सरकारी संम्पति को जलाया जा रहा है.गृह मंत्री अमित शाह संसद में पहले ही देश के सभी मुसलमानों को आश्वासत करा चुकें हैं कि देश के किसी भी मुसलमानों को डरने की जरूरत नहीं है. मुस्लिम समुदाय को गृह मंत्री को सुनना और विश्वास करना चाहिए.

मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि भीड़ का हिस्सा बनने से पहले कानून को जानना जरूरी है, न की सरकार का सिर्फ़ मात्र विरोध करना. मुस्लिम समुदाय के कहना है कि सरकार उनकी नागरिकता छीन रही है.सीसीए कानून में मुसलमानों को शामिल नहीं किया गया. इस कानून को मुस्लिम- विरोधी बताया जा रहा है. क्या आने वाले दिनों में सरकार लोगों को भय का भूत बनने से बचा पाएगी या नहीं?

असम एकॉर्ड 1985 क्या है?
तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने 15 अगस्त 1985 को असम समझौता किया था. कैब बिल को असम समझौते का उल्लंघन भी बताया जा रहा है. साल 1979 में असम राज्य में भारी संख्या में शरणार्थी शरण ले रहे थे. आल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने 6 साल तक विरोध- प्रदर्शन किया था. जिसके चलते 860 असम के लोगों को जान गवांनी पड़ी.

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