मेरे देश का मजदूर आखिर क्यों है इतना मजबूर?, जो दो वक्त की रोटी के लिए रहना पड़ता है उसे घर से दूर?

एक दिहाड़ी मजदूर पुरे दिन अपना खून पसीना बहा कर दो वक्त की रोटी कमाता है एक दिन काम न करने का मतलब है रोटी न मिलना, दो वक्त की रोटी की तलाश में जो मजदूर अपना गाँव, प्रदेश छोड़कर दुसरे प्रदेश में जाकर कमाते है और फिर अचानक से काम बंद करना पड़े तो जाहिर सी बात है या तो वे वहीं रह कर भूक से मर जाए या अपने गाँव वापस लौट जाए कुछ इसी तरह की परेशानी का सामना भारत में मजदूरों को करने पड़ रहा है।

25 मार्च की रात को महामारी संकट को देखते हुए अचानक से पूरे देश में तालाबंदी कर दी गई और अब तालाबंदी चौथे चरण में पहुँच चुकी है और पहले चरण से चौथे चरण के बीच तालाबंदी से कोई सबसे अधिक प्रभावित हुआ है तो वो है मजदूर वर्ग,पहली खाने की आफत,रहने की आफत और सबसे बड़ी मुसीबत जो मजदूर वर्ग पर कहर बन कर बरसी है है वो है घर जाने की आफत..वाहन उपलब्ध न होने के कारण भूखे-प्यासे मजदूर तपती धूप में कई सो किलो मीटर पैदल चलने के लिए मजबूर है जिनमे छोटे बच्चे ,बूढ़ी औरते, गर्भवती महिलाएं भी शामिल है।

फ़ाइल फ़ोटो

8 मई को रोड सेफ्टी NGO सेव लाइफ फाउंडेशन की एक रिसर्च आई जिसमे बताया गया कि पूरे देश में तालाबंदी दौरान 24 मार्च से 4 मई के बीच करीब 137 लोगो की मौत सड़क दुर्घटना में हुई है।आवश्यकता थी सरकार इस पर संज्ञान लेती लेकिन कोई ठोस कदम नही उठाया गया और लगातार हादसे होते रहे और मजदूर अपनी जान गवाते रहे 8 मई को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मालगाड़ी ने पटरी पर सोए 16 मजदुरो को कुचल दिया उनकी चीख-पुकार सुनने वाला कोई न था सिर्फ फिज़ाओ में सिसकिया गूँजती रही 10 मई को मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में पाठा गाँव के पास ट्रक पलटने से 5 मजदूरों की मौत हुई। 11 मई को साइकिल सवार श्रमिक की मौत,12 मई को हरियाणा के अंबाला में पैदल जा रहे मजदूरों को तेज़ रफ़्तार इनोवा ने कुचल दिया जिसमे एक मजदूर की मौत हो गई।

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इसी तरीक़े से उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में डीसीएम और ट्रैक के बीच भीषण टक्कर में 27 मजदूरों की मौत हो गई थी और 20 से अधिक घायल हुए थे । ऐसे ही हादसे लगातार आपके सामने रहे हैं जिनकी जानकारी आपको लगातार मिल रही हैं हादसे लगातार जारी हैं अब सवाल उठता है कि जो मजदूर रात दिन मेहनत करके देश के विकास में योगदान देते हैं क्या उनकी जिंदगी की कीमत सिर्फ इतनी है कि वह सड़कों पर ऐसे रोंधे जाएं रेल की पटरी पर ऐसे कटते जाएं।

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देश की पुलिस ऐसे समय में योद्धा के रूप में आई थी लेकिन सरकार के दबाव में पुलिस ने जिस तरीके से मजदूरों के साथ बर्बरता पूर्वक बर्ताव किया उसकी वीडियो आपके सामने आ रही है । सोशल मीडिया पर लगातार लोग मजदूरों के लिए आवाज तो उठा रहे हैं लेकिन सरकार बेबस नजर आ रही है मेरा एक सवाल है सरकार से कि क्या सरकार को हमारे देश की आर्थिक स्थिति के बारे में नहीं पता था कि लोग कब तक की अपना गुजारा अन्य स्थानों पर कर सकते हैं क्या सरकार के पास में प्रवासी मजदूरों का आंकड़ा नहीं था जो दूसरे राज्य में काम करते हैं सरकार घोषणा कर देती हैं और राशन की व्यवस्था की बात करती है लेकिन सरकार के प्रयास नाकाफी होते हैं और लोग कुछ दिन इंतजार करते हैं कि लोग डाउन खुले और वह अपने घर जाएं लेकिन लोग डाउन को तो बढ़ाया जाता है लेकिन उन प्रबंधन को नहीं बढ़ाया जाता जिनसे के मजदूरों को कोई राहत नहीं मिल पाती हैं

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सरकार ने राशन भी बांटा घोषणाएं भी की लेकिन हर प्रयास नाकाफी था जिसको देखते हुए मजदूर सड़कों पर पैदल निकलने को मजबूर हुए और जहां तहां प्रशासन की ज्यादती भी देखने को आई अब सरकार पर दबाव बना है सरकार प्रयास कर रही है कि किसी तरीके से वह इस दबाव को कम कर सके और और चौतरफा हो रही है चलो आलोचनाओं को किसी प्रकार से कम कर सके अभी भी हजारों लाखों की तादात में मजदूर सड़क पर हैं जिनको रोककर कवरांटाइन किया जा रहा है जो वो होना नहीं चाहते हैं अब सवाल यही उठता है वर्तमान सत्ताधारी पार्टी के लिए इस चुनौतीपूर्ण दौर में कैसे स्थिति को संभाल कर मजदूरों को राहत प्रदान की जाए मैं तो यही कहूंगा कित आत्मनिर्भरता की बात करने से बेहतर है कि फिलहाल जिन देशों ने इस पर काबू पाया है उनके मॉडल को फॉलो करते हुए सरकार को चाहिए के लोगों को राहत प्रदान करें और इस स्थिति को नियंत्रित करें।

रमशा रानी, एक एलएलबी की छात्रा की कलम से

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